अब शाम नहीं होती, दिन ढल रहा है…
शायद वक़्त सिमट रहा है!!
आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमाँ ये घर में आएँ तो चुभता नहीं धुआँ
यूँ भी इक बार तो होता कि समुंदर बहता
कोई एहसास तो दरिया की अना का होता
आप के बाद हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुज़ारी है

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई
आइना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते
ज़मीं सा दूसरा कोई सख़ी कहाँ होगा
ज़रा सा बीज उठा ले तो पेड़ देती है

खुली किताब के सफ़्हे उलटते रहते हैं
हवा चले न चले दिन पलटते रहते है
शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है

शबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में
एक पुराना ख़त खोला अनजाने में..
रात भर बातें करते हैं तारे…
रात काटे कोई किधर तन्हा

रात चुपचाप दबे पांव चली जाती है
रात ख़ामोश है रोती नहीं, हंसती भी नहीं
वो उदास उदास इक शाम थी,एक चेहरा था इक चिराग़ था
और कुछ नहीं था ज़मीन पर,इक आसमां का ग़ुबार था
तुम्हारे ख्वाब से हर शब लिपट के सोते हैं
सजाएं भेज दो ,हमने खताएं भेजी हैं

आदतन तुमने कर दिए वादे
आदतन हमने ऐ’तिबार किया
सहर न आई कई बार नींद से जागे
थी रात रात की ये ज़िंदगी गुज़ार चले
कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ
किसी की आँख में हम को भी इंतिज़ार दिखे
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